एक बार एक आदमी ने अपने खाली प्लॉट पर एक बोर्ड टांग दिया - "यह जमीन उसके लिए उपलब्ध है, जो अपने जीवन में वास्तव में संतुष्ट है।"
एक धनी व्यक्ति जब वहाँ से गुजरा, तो उसके मन में विचार आया - "मैंरे पास पर्याप्त धन है, सभी सुख सुविधाएँ हैं, परिवार सुखी है, मुझे और अधिक की आवश्यकता नहीं हैं अतः इस दृष्टि से मैं वास्तविक रूप से संतुष्ट हूँ और इस प्रकार इस जमीन का हकदार हूँ।" यह सब सोचते हुए वह व्यक्ति उस प्लॉट के मालिक के पास पहुँचा और उसे वही सब बातें बताईं कि वह किस प्रकार अपने जीवन से संतुष्ट है जिससे उसे वह प्लॉट दिया जाना चाहिए।
जमीन के मालिक ने प्रश्न किया, " तो तुम अपने जीवन में पूरी तरह संतुष्ट हो""
उस व्यक्ति ने उत्तर दिया, "निश्चित रूप से, क्योंकि मेरे पास वह सब कुछ है जिसकी मुझे व मेरे परिवार को आवश्यकता है। और किसी वस्तु की चाह नहीं है"
इस पर जमीन के मालिक ने मुस्कुराते हुए कहा, "मित्र! यदि वास्तव में तुम संतुष्ट हो और तुम्हारे पास वह सब कुछ है जो तुम्हें चाहिए, तो फिर इस जमीन का क्या करोगे? इसकी चाहत क्यों पैदा हुई?"
वह व्यक्ति अब मौन एवं निरुत्तर था। वह समझ आ गया कि सर्व-साधन संपन्न होकर सुखी होने का अर्थ संतुष्टि नहीं होता। संतुष्र्ट होने का वास्तविक अर्थ इच्छाओं की समाप्ति है, जो मात्र ज्ञान और समझ से ही प्राप्त होती है।

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